तर्ज़-आओ बच्चो तुम्हें------।
टेक-इस दरबार का झण्डा सारी सृष्टि में लहराय रहा।
परम शान्ति सुख पाता प्राणी, इस दर पे जो आये रहा।।
1.दिन दुगनी और रात चौगुनी, आनन्दपुर की शान है।
प्रेंमी भक्त जनों के घट में, फकत गुरु का मान है।
परमहँस निर्माता इसके, तभी तो यह हर्षाय रहा।।
2.महातीर्थ आनन्द सरोवर, सब तीर्थों का ताज है।
सदा खेलता अठखेली में, इस पे उसको नाज़ है।
त्रिभुवन मोहन सतगुरु उससे, अपने चरण धुलाय रहा।।
3.इस नगरी के कण कण में, कोई ऐसा तेज निराला है।
जो इसकी रज भाल चढ़ाता, दर्जा उसका आला है।
जन जन इस की महिमा अनुपम,निज मुख से है गाय रहा।।
4.विधि हरि हर और शेष-शारदा यश गा गा कर हारे हैं।
भवसागर में बहते प्राणी, लाखों पार उतारे हैं।
चौदह भुवनों में है सुन्दर, दासनदास सुनाय रहा।।
टेक-इस दरबार का झण्डा सारी सृष्टि में लहराय रहा।
परम शान्ति सुख पाता प्राणी, इस दर पे जो आये रहा।।
1.दिन दुगनी और रात चौगुनी, आनन्दपुर की शान है।
प्रेंमी भक्त जनों के घट में, फकत गुरु का मान है।
परमहँस निर्माता इसके, तभी तो यह हर्षाय रहा।।
2.महातीर्थ आनन्द सरोवर, सब तीर्थों का ताज है।
सदा खेलता अठखेली में, इस पे उसको नाज़ है।
त्रिभुवन मोहन सतगुरु उससे, अपने चरण धुलाय रहा।।
3.इस नगरी के कण कण में, कोई ऐसा तेज निराला है।
जो इसकी रज भाल चढ़ाता, दर्जा उसका आला है।
जन जन इस की महिमा अनुपम,निज मुख से है गाय रहा।।
4.विधि हरि हर और शेष-शारदा यश गा गा कर हारे हैं।
भवसागर में बहते प्राणी, लाखों पार उतारे हैं।
चौदह भुवनों में है सुन्दर, दासनदास सुनाय रहा।।
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