तर्ज़--दिल के अरमाँ-----।
टेक--संगति में आ के तू सतपुरुषों की।
सीख ले युक्ति तू उनसे जीने की।।
1. जिस सुख की तलाश में तू दौड़ रहा।
सतगुरु के चरणों में है वो सुख भरा।
तार चरणों से जोड़ दे सुरति की।।
2. सत और झूठ का वो ज्ञान करवाते हैं।
निजघर का रास्ता तुझे दिखलाते हैं।
भक्ति मुक्ति उनके चरणों में पड़ी।।
3. जिसने इस नुक्ते को दिल में बसा लिया।
जीवन के मकसद को उसने पा लिया।
रहती फिर उसको कुछ भी न कमी।।
4. मान ले ये बात सन्तों की तू ऐ बशर।
आसान हो जायेगा तेरा ये सफर।
पायेगा मन्ज़िल को तू फिर निश्चय ही।।
टेक--संगति में आ के तू सतपुरुषों की।
सीख ले युक्ति तू उनसे जीने की।।
1. जिस सुख की तलाश में तू दौड़ रहा।
सतगुरु के चरणों में है वो सुख भरा।
तार चरणों से जोड़ दे सुरति की।।
2. सत और झूठ का वो ज्ञान करवाते हैं।
निजघर का रास्ता तुझे दिखलाते हैं।
भक्ति मुक्ति उनके चरणों में पड़ी।।
3. जिसने इस नुक्ते को दिल में बसा लिया।
जीवन के मकसद को उसने पा लिया।
रहती फिर उसको कुछ भी न कमी।।
4. मान ले ये बात सन्तों की तू ऐ बशर।
आसान हो जायेगा तेरा ये सफर।
पायेगा मन्ज़िल को तू फिर निश्चय ही।।
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