तर्ज़--मैं तो सतगुरु के ------।
टेक--करूँ बन्दगी मैं निशदिन तुम्हारी।
दिल में चाह ये भारी।।
1. सेवा भक्ति में चित को लगाऊँ।
इक पल भी न व्यर्थ गवाऊँ।
बीते चरणों ज़िन्दगी सारी।।
2. निसदिन ह्मदय मन्दिर को सजाकर।
उसमें ध्यान तुम्हारा बसा कर।।
छवि हर पल देखूँ ये प्यारी।।
3. नाम से घट में होवे उजेरा।
मिट जाये माया का अन्धेरा।
भक्ति दे दो मुझे ऐसी प्यारी।।
4. करे रसना तेरा गुणगान।
और दिल में तुम्हारा ध्यान।
चरणों पे जाऊँ बलिहारी।।
5. श्री आज्ञा को सीस चढ़ाऊँ।
रैन दिन बस तुमको रिझाऊँ।
दास रहमत का है भिखारी।।
टेक--करूँ बन्दगी मैं निशदिन तुम्हारी।
दिल में चाह ये भारी।।
1. सेवा भक्ति में चित को लगाऊँ।
इक पल भी न व्यर्थ गवाऊँ।
बीते चरणों ज़िन्दगी सारी।।
2. निसदिन ह्मदय मन्दिर को सजाकर।
उसमें ध्यान तुम्हारा बसा कर।।
छवि हर पल देखूँ ये प्यारी।।
3. नाम से घट में होवे उजेरा।
मिट जाये माया का अन्धेरा।
भक्ति दे दो मुझे ऐसी प्यारी।।
4. करे रसना तेरा गुणगान।
और दिल में तुम्हारा ध्यान।
चरणों पे जाऊँ बलिहारी।।
5. श्री आज्ञा को सीस चढ़ाऊँ।
रैन दिन बस तुमको रिझाऊँ।
दास रहमत का है भिखारी।।
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