है भरी रहमत ही रहमत सतगुरु तेरे प्यार में।।
पार बहरेदहर से फिर वो यकीनन हो गया।
दे दिया जिसने सफीना बस तेरे इख्तियार में।।
मन को अपनी ज़िन्दगी की सौंपी जिस पतवार है।
उसका बेड़ा एक दिन डूबेगा फिर मँझधार में।।
दुःख दर्द रंज़ो अलम सब उसके हो जाते हैं दूर।
छोड़ उल्फत दुनियां की जो आ गया दरबार में।।
ज़िन्दगी भरपूर रहती है सकूनो चैन से।
सुरति जिसने जोड़ दी सतगुरु तेरे दीदार में।।
तू है बख्शिश का मुजस्मा तेरी शोहरत आम है।
गलतियां हरगिज़ न लाते किसी की शुमार में।।
बनके राहबर तुमने ही मुझको बचाया सतगुरु।
भटकता रहता वगरना दुनियां ए पुरखार में।।
हैं तेरे एहसान कितने मैं बयां कैसे करूँ।
है कहाँ ताकत ज़ुबां में लाये जो इज़हार में।।
साया ए रहमत में अपने तूने दी मुझको पनाह।
नुक्स हैं माना बहुत इस ना-अहल गुनाहगार में।।
जाम इक उल्फत का अपने दास को भी बख्श दे।
क्या कमी होगी भला तेरे भरे भण्डार में।।
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