Thursday, March 24, 2016

तेरी रहमत से प्रभुवर, मिल गई मन्ज़िल मुझे।

तर्ज़-आपकी नज़रों ने समझा-----।
टेक-तेरी रहमत से प्रभुवर, मिल गई मन्ज़िल मुझे।
 खुशनसीबी से मिले जब, पीर तुम कामिल मुझे।।

1. क्यों फिरूँ अब मारा मारा, झूठे जग के प्यार में।
मिल गई है शरण मुझको, आप के चरणार में।
अब फँसायेगी भला क्या, माया की दलदल मुझे।।
2. नाव मेरी तो प्रभु जी, अब हवाले है तेरे।
कैसा डर तूफानों का जब हो खेवैया तुम मेरे।
अब तो मिल ही जायेगा, खुद-ब-खुद साहिल मुझे।।
3. राहे-भक्ति पर चलूं मैं , झूठे जग से तोड़ के।
सदा ही रखूं तार दिल की, श्री चरणों से जोड़ के।
अपने दीवानों में करना, है प्रभु शामिल मुझे।।
4. मेरे सिर पे तुम धनी हो, फिर भला कैसा फिकर।
गाऊँ महिमा तेरी हरदम, और करूँ तेरा ज़िकर।
एक पल भी दृष्टि से न, करना कभी ओझल मुझे।।
5. दासा तन मन और चित्त से, कर प्रभु आराधना।
इसके सिवा दिल में तेरे, रहे न कोई कामना।

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