तर्ज़--दिल लूटने वाले-------।
टेक--जीवन नैया भव आन पड़ी इसको प्रभु पार लगा देना।
इस डूबती जीवन नैया को ऐ नाथ किनारे लगा देना।।
1.संसार समुन्द्र की लहरों में निशदिन बहता जाऊँ मैं।
गम्भीर अथाह यह धारा है इसका कुछ पार न पाऊँ मैं।
यह भीर बनी भारी मुझपर ऐ स्वामी भीर हटा देना।।
2.लहरों की दया पर है नौका पल पल में ठोकरें खाती है।
ऐसा लगता है मानो अभी पल भर में डूबी जाती है।
लहरों के थपेड़े खाती इस नौका को पार लगा देना।।
3.बिन माँझी के ये नौका कब तक यों हिचकोले खायेगी।
तेरा न सहारा मिले जब तक क्योंकर उस पार ये जायेगी।
पतवार सँभाल ले ऐ माँझी निजधाम के तट पहुँचा देना।।
4.इस अपने दास बेचारे पर उपकार करो उपकारक हो।
भूले भटकों का सहज सहज निस्तार करो निस्तारक हो।
सब तजके सहारा लिया तेराअब बिगड़ी दशा बना देना।।
टेक--जीवन नैया भव आन पड़ी इसको प्रभु पार लगा देना।
इस डूबती जीवन नैया को ऐ नाथ किनारे लगा देना।।
1.संसार समुन्द्र की लहरों में निशदिन बहता जाऊँ मैं।
गम्भीर अथाह यह धारा है इसका कुछ पार न पाऊँ मैं।
यह भीर बनी भारी मुझपर ऐ स्वामी भीर हटा देना।।
2.लहरों की दया पर है नौका पल पल में ठोकरें खाती है।
ऐसा लगता है मानो अभी पल भर में डूबी जाती है।
लहरों के थपेड़े खाती इस नौका को पार लगा देना।।
3.बिन माँझी के ये नौका कब तक यों हिचकोले खायेगी।
तेरा न सहारा मिले जब तक क्योंकर उस पार ये जायेगी।
पतवार सँभाल ले ऐ माँझी निजधाम के तट पहुँचा देना।।
4.इस अपने दास बेचारे पर उपकार करो उपकारक हो।
भूले भटकों का सहज सहज निस्तार करो निस्तारक हो।
सब तजके सहारा लिया तेराअब बिगड़ी दशा बना देना।।
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