Wednesday, August 24, 2016

री सतगुरु किरपा कर हमको बार बार समझाते हैं।

तर्ज़-रामचन्द्र कह गये-------।
        टेक-श्री सतगुरु किरपा कर हमको बार बार समझाते हैं।
                जिसमें भला हमारा है यह भेद हमें बतलाते हैं।।

        1.        सतगुरु जैसा मीत नहीं कोई, और जगत में पाया है।
                भूले भटके जीवों को जो, राह सीधी दिखलाते हैं।।

        2.        निर्भर अपने ख्यालों पे है, जीव का दुःखी सुखी होना।
                इसीलिये ये सतसंगत की, महिमा सदा फरमाते हैं।।

        3.        अपने साथ मिलाने आये, पर उपकारी सतगुरु मेरे।
                जिनकी संगत सोहबत से,बिगड़े कारज बन जाते हैं।।

        4.        वही सुखी प्राणी है जग में, जिन्हों को प्रभु प्यार मिला।
                जगत की झूठी मोह ममता में, वह न कभी भरमाते हैं।।

        5.        दासनदासा गुरु वचनों का, मिला जो हमें खज़ाना।  
                वही राह अपनायें सदा, जिस राह पे सन्त चलाते हैं।।

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