तर्ज़--जी मैं लख लख खुशियाँ------।
टेक--पाया जदों दा मैं तेरा द्वारा मैं सुखाँ दा भण्डार पा लिया।
सतगुराँ जी नूं अपना बणा के नवाँ संसार पा लिया।।
1. बहुत गुराँ जी दी होई मेहरबानी ए।
बख्शी जिन्हाँ ने सच्ची दात रुहानी ए।
सुत्ते जाग पये कर्म ने मेरे जो साहिब दा दीदार पा लिया।।
2. गुरु दरबार दी ऐ ही पढ़ाई ऐ।
सिधी ऐही गल जिन्दी समझ विच आई ए।
बहुत लोड़ नहीं पढ़न पढ़ान दी भेद असाँ सार पा लिया।।
3. मोह माया ने पाया सी घेरा।
रंग ढंग सारा बिगड़िया सी मेरा।
ऐसा प्रेम दा जादू चलाया बन्धन तो छुटकार पा लिया।।
4. शरण गुराँ दी असीं जे न आँदे।
पता नहीं कित्थे कित्थे धक्के होर खाँदे।
पुण्य कर्म दी ऐही निशानी ऐ सच्चा दरबार पा लिया।।
5. उपकार गुराँ जी दे किवें सुनाईये।
चरण कमल सदा ह्मदय वसाईये।
जेहड़ा सबनूँ बख्शनहारा ओ सच्चा करतार पा लिया।।
6. दास गुराँ जी दा द्वार न छोड़ीं।
गुरु सेवा तो कदी मुँह न मोड़ीं।
जेहड़ी शै न कित्थे मिलदी ऐत्थे औ भण्डार पा लिया।।
टेक--पाया जदों दा मैं तेरा द्वारा मैं सुखाँ दा भण्डार पा लिया।
सतगुराँ जी नूं अपना बणा के नवाँ संसार पा लिया।।
1. बहुत गुराँ जी दी होई मेहरबानी ए।
बख्शी जिन्हाँ ने सच्ची दात रुहानी ए।
सुत्ते जाग पये कर्म ने मेरे जो साहिब दा दीदार पा लिया।।
2. गुरु दरबार दी ऐ ही पढ़ाई ऐ।
सिधी ऐही गल जिन्दी समझ विच आई ए।
बहुत लोड़ नहीं पढ़न पढ़ान दी भेद असाँ सार पा लिया।।
3. मोह माया ने पाया सी घेरा।
रंग ढंग सारा बिगड़िया सी मेरा।
ऐसा प्रेम दा जादू चलाया बन्धन तो छुटकार पा लिया।।
4. शरण गुराँ दी असीं जे न आँदे।
पता नहीं कित्थे कित्थे धक्के होर खाँदे।
पुण्य कर्म दी ऐही निशानी ऐ सच्चा दरबार पा लिया।।
5. उपकार गुराँ जी दे किवें सुनाईये।
चरण कमल सदा ह्मदय वसाईये।
जेहड़ा सबनूँ बख्शनहारा ओ सच्चा करतार पा लिया।।
6. दास गुराँ जी दा द्वार न छोड़ीं।
गुरु सेवा तो कदी मुँह न मोड़ीं।
जेहड़ी शै न कित्थे मिलदी ऐत्थे औ भण्डार पा लिया।।
No comments:
Post a Comment