Thursday, November 17, 2016

दुर्लभ मानुष तन को पाकर दुर्लभ वस्तु को पाना है।

तर्ज़--दिल लूटने वाले-----।
टेक--दुर्लभ मानुष तन को पाकर दुर्लभ वस्तु को पाना है।
                मालिक की भक्ति कमा करके इस जन्म का लाभ उठाना है।।

1.इस दुर्लभ देहि की महिमा सन्तों ग्रन्थों ने उचारी है।
        इस जीवन की जो करता कदर उसे कीमत मिलती भारी है।
            हर घड़ी हर पल हर स्वांस स्वांस मालिक का नाम ध्याना है।।

2.तेरे जीवन का जो मकसद है सतपुरुष तुझे बतलाते हैं।
        अपने सुन्दर उपदेशों से प्रभु की पहचान कराते हैं।
            सतगुरु की पावन सेवा कर लोक और परलोक बनाना है।।

3.है असली काम तेरा जग में केवल प्रभु की भक्ति करना।
        सिवा इसके दीगर कामों में तुम चित को कभी नही धरना।
            दुनियाँ के बखेड़ों में फँसकर मकसद को नहीं भुलाना है।।

4.यह लक्ष्य तभी होगा हासिल जब दास गुरु का बन जायेगा।
        होगा जीवन सफल तेरा जब सतगुरु के गुण गायेगा।
            चलकर श्री मौज और आज्ञा में सतगुरु प्यारे को रिझाना है।।

Friday, November 11, 2016

रभु जी हमें भूल न जाना कर्म इतना फरमाना।

तर्ज़--बड़ा बेदर्द जहाँ है ये----।
        टेक--प्रभु जी हमें भूल न जाना कर्म इतना फरमाना।
                जैसे भी हो सके तो जल्दी ही आना।।

        1.        तुमसे बिछुड़ कर मेरे प्रीतम दिल को चैन न आये।
                  हर समय दुःख गम के बादल रहते दिल पे छाये।
                    दर्श की प्यासी आँखें हर पल पल ये तड़पें।
                        मुश्किल हो जाता है इक पल बिताना।।
        2.        तुम बिन सूनी सूनी लगती नगरी श्री आनन्दपुर की।
                  विरह अग्नि सी बढ़ जाती है पीर मेरे ह्मदय की।
                    लगे सब ओर अन्धियारा सूझे न कोई किनारा।
                        दुखी दिल को प्रभु धीर बँधाना।।
        3.        दिल का हाल सुनाऊँ किसको तुम बिन कौन है मेरा।
                  तुम संग ही बहारें मुझको जीवन में भी उजेरा।
                    सुन लो दिल की पुकार मेरे दयालु दातार।
                        अपने विरद की लाज बचाना।।
        4.        करुणा के सागर मेरे स्वामी जल्दी देना दीदार।
                  आपके श्री चरणों में दास की अर्ज़ ये बारम्बार।
                    न देखना मेरे अवगुण करना ये रहमत भगवन।
                         प्यासी अँखियों की प्यास बुझाना।।

Sunday, November 6, 2016

झल्ली जांदी न जुदाई सोहणे पीर दी

टेक-झल्ली जांदी न जुदाई सोहणे पीर दी, न किसे दा प्यारा बिच्छड़े।
    होवे अखिआं तों ओहले सोहणा यार जी, पैण बे-शुमार दुःखड़े।।
4.प्रेम सच्चे दा मैं हाल हाँ सुणावंदा। बिना गुरु दे ना होर कुझ भांवदा।
   लग्गे होण ढेर दौलतां हज़ार जी, ना किसे दा प्यारा बिच्छड़े।।
5.दस्सां गुरु दे विछोड़े वाला हाल जी। बिते इक दिन बराबर कई साल जी।
  कदी आँवदा ना सबर करार जी, ना किसे दा प्यारा विच्छड़े।।
7.इक पीर बिना सुन्ना दिससे जग्ग जी। लाटां मारदी जुदाई वाली अग्ग जी।
   दर्शन गुरु दा सीने नूँ देन्दा ठार जी, न किसे दा प्यारा विच्छड़े।।
8.'सतनाम जी'जुदाई झल्ल सके ना। याद कर "मस्ताना जी' नूं थके ना।
    नालों एस जुदाई देन्दा मार जी, ना किसे दा प्यारा विच्छड़े।।

Wednesday, November 2, 2016

छत्रछाया श्री सतगुरु की खुशियों का भण्डार।

तर्ज़-सबसे सुन्दर------।
टेक-छत्रछाया श्री सतगुरु की खुशियों का भण्डार।
        महिमा श्री सतगुरु जी की फैली सब संसार।।
            सदा तेरा प्यार पाऊं, और तुझको ही ध्याऊं।।
1.    निर्मल प्यार है पाया , प्रभु चरण शरण में आके।
        पाया प्रभु अविनाशी, कई जन्मों के भाग हैं जागे।
            पूरा सतगुरु पाया हमने, महिमा जिनकी अपार।।
2.    नाम को जपने वाला, होता है गुरु को प्यारा।
        अन्तर्मुख हो जो रहता , रहता जग से न्यारा।
            ज्ञान की ज्योति जगाते भगवन, गुरु हैं बख्शनहार।।
3.    अनहद नाद सुनाकर, सब कारज करते रास।
        शब्द की है ये कुन्जी, पूरे सतगुरु के पास।
            कई जन्मों के पुण्य करम से पाया है गुरुद्वार।।
4.    भाग हमारे जागे पाये हमने प्रभु प्यारे।
        खुशनसीब हैं सब पाये जो सुन्दर नज़ारे।
            यहाँ मिलेगा ऐसा हमको बिन स्वार्थ का प्यार।।
5.    धन्यवाद गुरु का दासा, शुक्रिया बारम्बार।
        एहसान गुरु का भारा, महिमा है अपरम्पार।
            भक्तों के आधार प्रभु हैं सन्तों के सिरताज।।